YOUTH – THE PLACE FOR LUST

 

श्रीरामजी बोले, हे मुनीश्वर दुःखरूप बाल्यावस्था के अनन्तर युवावस्था आती है सो नीचे से ऊँचे चढ़ती है । वह भी उत्तम नहीं अधिक दुःखदायक है । जब युवावस्था आती है तब कामरूपी पिशाच आ लगता है । वह कामरूपी पिशाच युवावस्थारूपी गढ़े में आ स्थित होता है, चित्त को फिराता है और इच्छा पसारता है । जैसे सूर्य के उदय होने से सूर्य मुखी कमल खिल आता है और पँखुरियों को पसारता है वैसे ही युवावस्थारूपी सूर्य उदय होकर चित्तरूपी कमल और इच्छारूपी पँखुरी को पसारता है । फिर जैसे किसी को अग्नि के कुंड में डाल दिया हो और वह दुःख पावे वैसे ही कामके वश हुआ दुःख पाता है । हे मुनीश्वर! जो कुछ विकार हैं सो सब युवावस्था में प्राप्त होते हैं । जैसे धनवान् को देखके सब निर्धन धन की आशा करते हैं वैसे ही युवावस्था देखकर सब दोष इकट्ठे होते हैं जो भोग को सुखरूप जानकर भोग की इच्छा करता है वह परम दुःख का कारण है । जैसे मद्य का घट भरा हुआ देखने मात्र सुन्दर लगता है परन्तु जब उसको पान करे तब उन्मत्त होकर दीन हो जाता है और निरादर पाता है वैसे ही भोग देखने मात्र सुन्दर भासते हैं , परन्तु जब इनको भोगता है तब तृष्णा से उन्मत्त और पराधीन हो जाता है । हे मुनीश्वर! यह काम, क्रोध, मोह और अहंकार आदि सब चोर युवारूपी रात्रि को देखकर लूटने लगते हैं और आत्मज्ञान रूपी धन को ले जाते हैं । इससे जीव दीन होता है । आत्मानन्द के वियोग से ही जीव दीन हुआ है । हे मुनीश्वर! ऐसी दुख देनेवाली युवावस्था को मैं अंगीकार नहीं करता । शान्ति चित्तको स्थिर करने के लिये है पर युवावस्था में चित्त विषय की ओर धावता है जैसे बाण लक्ष्य की ओर जाता है । तब उसको विषय का संयोगहोता है और विषय की तृष्णा निवृत्त नहीं होती और तृष्णा के मारे जन्म से जन्मान्तर में दुःख पाता है । हे मुनिश्वर! ऐसी दुःखदायक युवावस्था की मुझको इच्छा नहीं है । हे मुनीश्वर! जैसे प्रलयकाल में सब दुःख आकर स्थिर होते हैं वैसे ही काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार , चपलता इत्यादिक सब दोष युवावस्था में आ स्थिर होते हैं जो सब बिजली की चमक से हैं,होके मिट जाते हैं । जैसे समुद्र तरंग होकर मिट जाते हैं वैसे ही यह क्षणभंगुर है और वैसे ही युवावसथा होके मिट जाती है । जैसे स्वप्न में कोई स्त्री विकार से छल जाती है वैसे ही अज्ञान से युवावस्था छल जाती है । हे मुनीश्वर! युवावस्था जीव की परम शत्रु है । जो पुरुष इस शत्रु से बचे हैं वही धन्य हैं । इसके शस्त्र काम और क्रोध हैं जो इनसे छूटा वह वज्र के प्रहार से भी न छेदा जायेगा और जो इनसे बँधा हुआ है वह पशु है । हे मुनीश्वर! युवावस्था देखने में तो सुन्दर है परन्तु भीतर से तृष्णा से जर्जरीभूत है । जैसे वृक्ष देखने में तो सुन्दर हो परन्तु भीतर से घुन लगा हुआ हो वैसे ही युवावस्था है जो भोगों के निमित्त यत्न करती है वे भोग आपात-रमणीय हैं । कारण यह कि जब तक इन्द्रियों और विषयों का संयोग है तब तक अविचार से भला लगता है और जब वियोग होता है तब दुःख होता है । इसलिए भोग करके मूर्ख प्रसन्न और उन्मत्त होते हैं उनको शान्ति नहीं होती भीतर सदा तृष्णा रहती है और स्त्री में चित्त की आसक्ति रहती है । जब इष्ट वनिता का वियोग होता है तब उसको स्मरण करके जलता है जैसे वन का वृक्ष अग्नि से जलता है वैसे ही युवावस्था में इष्ट के वियोग से जीव जलता है । जैसे उन्मत्त हस्ती जंजीर से बँधता तो स्थिर होता है कहीं जा नहीं सकता वैसे ही कामरूपी हस्ती को जंजीररूपी युवावस्था बन्धन करती है । युवावस्थारूपी नदी है उसमें इच्छारूपी तरंग उठते हैं वे कदाचित् शान्ति नहीं पाते । हे मुनीश्वर! यह युवावस्था बड़ी दुष्ट है । बड़े बुद्धिमान्, निर्मल और प्रसन्न पुरुष की बुद्धि को भी मलिन कर डालती है । जैसे निर्मल जल की बड़ी नदी वर्षाकाल में मलिन हो जाती है वैसे ही युवावस्था में बुद्धि मलिन हो जाती है । हे मुनीश्वर! शरीररूपी वृक्ष है उसमें युवावस्थारूपी बेलि प्रकट होती है सो पुष्ट होती जाती है तब चित्तरूपी भँवरा आ बैठता है और तृष्णारूपी उसकी सुगन्ध से उन्मत्त होता है, सब विचार भूल जाता है । जैसे जब प्रबल पवन चलता है तब सूखे पत्रों को उड़ा ले जाता है वैसे ही युवावस्था वैराग्य; सन्तोषादिक गुणों का अभाव करती है । दुःखरूपी कमल का युवावस्थारूपी सूर्य है, इसके उदय से सब प्रफुल्लित हो जाते हैं । इससे सब दुःखों का मूल युवावस्था है । जैसे सूर्य के उदय से सूर्यमुखी कमल खिल आते हैं वैसे ही चित्तरूपी कमल संसाररूपी पँखुरी और सत्यतारूपीसुगन्ध से खिल आता है और तृष्णारूपी भँवरा उस पर आ बैठता और विषय की सुगन्ध लेता है । हे मुनीश्वर! संसार रूपी रात्रि है उसमें युवावस्थारूपी तारागण प्रकाशते हैं अर्थात् शरीर युवावस्था से सुशोभित होता है । जैसे धान के छोटे वृक्ष हरे तब तक रहते हैं जबतक उसमें फल नहीं आता । जब फल आता है तब वृक्ष सूखने लगते हैं और अन्न परिपक्व होता है वृक्ष की हरियाली नहीं रह सकती वैसे ही जब तक जवानी नहीं आती तब तक शरीर सुन्दर कोमल रहता है जब जवानी आती है तब शरीर क्रूर हो जाता है और फिर परिपक्व होकर क्षीण और वृद्ध होता है । इससे हे मुनीश्वर! ऐसी दुःख की मूलरूप युवावस्था की मुझको इच्छा नहीं । जैसे समुद्र बड़े जल से तरंगो को पसारता और उछालता है तो भी मर्यादा नहीं त्यागता, क्योंकि ईश्वर की आज्ञा मर्यादा में रहने की है और युवावस्था तो ऐसी है कि शास्त्र और लोक की मर्यादा मेट के चलती है और उसका अपना विचार नहीं रहता । जैसे अन्धकार में पदार्थ का ज्ञान नहीं होता वैसे ही युवावस्था में शुभाशुभ का विचार नहीं होता । जिसको विचार नहीं रहा उसको शान्ति कहाँ से हो; वह सदा व्याधि और ताप से जलता रहता है । जैसे जल के बिना मच्छ को शान्ति नहीं होती वैसे ही विचार के बिना पुरुष सदा जलता रहता है । जब युवावस्थारूप रात्रि आती है तब काम पिशाच आके गर्जता है और यही संकल्प उठते हैं कि कोई कामी पुरुष आवे तो उसके साथ मैं यही चर्चा करूँ कि हे मित्र! वह स्त्री कैसी सुन्दर है और उसके कैसे कटाक्ष हैं । हे मुनीश्वर! इस इच्छा में वह सदा जलता ही रहता है जैसे मरुस्थल की नदी को देख मृग दौड़ता है और जल की अप्राप्ति से जलता है वैसे ही कामी पुरुष विषय की वासना से जलता है और शान्ति नहीं पाता । हे मुनीश्वर! मनुष्य जन्म उत्तम है परन्तु जिनके अभाग्य हैं उनको विषय से आत्मपद की प्राप्ति नहीं होती । जैसे किसी को चिन्तामणि प्राप्त हो और वह उसका निरादर करे उसका गुण न जानकर डाल दे वैसे ही पुरुष ने मनुष्य शरीर पाकर आत्मपद नहीं पाया वह बड़ा अभागी है और मूर्खता से अपने जन्म को व्यर्थ खो डालता है वह युवावस्था में परम दुःख का क्षेत्र अपने निमित्त बोता है और मान,मोह मद इत्यादि विकारों से पुरुषार्थ का नाश करता है । हे मुनीश्वर! युवावस्था ऐसे बड़े विकारों को प्राप्त करती है । जैसे नदी वायु से अनेक तरंग पसारती है वैसे ही युवावस्था चित्त के अनेक कामों को उठाती है । जैसे पक्षी पंख से बहुत उड़ता है और जैसे सिंह भुजा के बल से पशु को मारने दौड़ता है वैसे ही चित्त युवावस्था से विक्षेप की ओर धावता है । हे मुनीश्वर! समुद्र का तरना कठिन है क्योंकि उसमें जल अथाह है उसका विस्तार भी बड़ा है और उसमें कच्छ मच्छ मगर भी बड़े बड़े जीव रहते हैं पर मैं उसका तरना भी सुगम मानता हूँ परन्तु युवावस्था का तरना महाकठिन है अर्थात् युवावस्था में जो चलायमान नहीं होते सो पुरुष धन्य हैं और वन्दना करने योग्य हैं हे मुनीश्वर! यह युवावस्था चित्त को मलीन कर डालती है । जैसे जल की बावली के निकट राख और काँटे हों और पवन चलने से सब आ बावली में गिरें वैसे ही पवनरूपी युवावस्था दोषरूपी धूल और काँटों को चित्तरूपी बावली में डाल के मलीन कर देती है । ऐसे अवगुणों से पूर्ण युवावस्था की इच्छा मुझको नहीं है । युवावस्था मुझ पर यही कृपा कर कि तेरा दर्शन न हो । तेरा आना मैं दुःख का कारण मानता हूँ । जैसे पुत्र के मरण का संकट पिता नहीं सह सकता और सुख का निमित्त नहीं देखता वैसे ही तेरा आना मैं सुख का निमित्त नहीं देखता इससे मुझपर दया कर कि अपना दर्शन न दे । हे मुनीश्वर! युवावस्था का तरना महा कठिन है । यौवनवान् नम्रतासंयुक्त नहीं होते और शास्त्र के गुण वैराग्य विचार संतोष और शान्ति इनसे भी सम्पन्न नहीं हैं । जैसे आकाश में वन होना आश्चर्य है वैसे ही युवावस्था में वैराग्य,विचार, शान्ति और संतोष होना भी बड़ी आश्चर्य है । इससे आप मुझसे वही उपाय कहिये जिससे युवावस्था के दुःख से मुक्ति होकर आत्मपद की प्राप्ति हो ।

One Response to “YOUTH – THE PLACE FOR LUST”

  1. Maneesh 15/12/2010 at 1:51 PM #

    इससे आप मुझसे वही उपाय कहिये जिससे युवावस्था के दुःख से मुक्ति होकर आत्मपद की प्राप्ति हो ???

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