Tag Archives: asharamji bapu

Leelashah Maharaj message to Health and food minister.

30 Jan

Hariom,

Please read this blog and then i will tell u why it is stated as message to AGRICULTURE MINISTER AND HEALTH MINISTER .

भोजन का प्रभाव

सुखी रहने के लिए स्वस्थ रहना आवश्यक है। शरीर स्वस्थ तो मन स्वस्थ। शरीर की तंदुरूस्ती भोजन, व्यायाम आदि पर निर्भर करती है। भोजन कब एवं कैसे करें, इसका ध्यान रखना चाहिए। यदि भोजन करने का सही ढंग आ जाय तो भारत में कुल प्रयोग होने वाले खाद्यान्न का पाँचवाँ भाग बचाया जा सकता है।

भोजन नियम से, मौन रहकर एवं शांत चित्त होकर करो। जो भी सादा भोजन मिले, उसे भगवान का प्रसाद समझकर खाओ। हम भोजन करने बैठते हैं तो भी बोलते रहते हैं। ‘पद्म पुराण’ में आता है कि ‘जो बातें करते हुए भोजन करता है, वह मानों पाप खाता है।’ कुछ लोग चलते-चलते अथवा खड़े-खड़े जल्दबाजी में भोजन करते हैं। नहीं ! शरीर से इतना काम लेते हो, उसे खाना देने के लिए आधा घंटा, एक घंटा दे दिया तो क्या हुआ ? यदि बीमारियों से बचना है तो खूब चबा-चबाकर खाना खाओ। एक ग्रास को कम से कम 32 बार चबायें। एक बार में एक तोला (लगभग 11.5 ग्राम) से अधिक दूध मुँह में नहीं डालना चाहिए। यदि घूँट-घूँट करके पियेंगे तो एक पाव दूध भी ढाई पाव जितनी शक्ति देगा। चबा-चबाकर खाने से कब्ज दूर होती है, दाँत मजबूत होते हैं, भूख बढ़ती है तथा पेट की कई बीमारियाँ भी ठीक हो जाती हैं।

भोजन पूर्ण रूप से सात्त्विक होना चाहिए। राजसी एवं तामसी आहार शरीर एवं मन बुद्धि को रूग्न तथा कमजोर करता है। भोजन करने का गुण शेर से ग्रहण करो। न खाने योग्य चीज को वह सात दिन तक भूखा होने पर भी नहीं खाता। मिर्च-मसाले कम खाने चाहिए। मैं भोजन पर इसलिए जोर देता हूँ क्योंकि भोजन से ही शरीर चलता है। जब शरीर ही स्वस्थ नहीं रहेगा तब साधना कहाँ से होगी ? भोजन का मन पर भी प्रभाव पड़ता है। इसीलिए कहते हैं- जैसा खाये अन्न, वैसा बने मन। अतः सात्त्विक एवं पौष्टिक आहार ही लेना चाहिए।

मांस, अण्डे, शराब, बासी, जूठा, अपवित्र आदि तामसी भोजन करने से शरीर एवं मन-बुद्धि पर घातक प्रभाव पड़ता है, शरीर में बीमारियाँ पैदा हो जाती हैं। मन तामसी स्वभाववाला, कामी, क्रोधी, चिड़चिड़ा, चिंताग्रस्त हो जाता है तथा बुद्धि स्थूल एवं जड़ प्रकृति की हो जाती है। ऐसे लोगों का हृदय मानवीय संवेदनाओं से शून्य हो जाता है।

खूब भूख लगने पर ही भोजन करना चाहिए। खाने का अधिकार उसी का है जिसे भूख लगी हो। कुछ नासमझ लोग स्वाद लेने के लिए बार-बार खाते रहते हैं। पहले का खाया हुआ पूरा पचा न पचा कि ऊपर से दुबारा ठूँस लिया। ऐसा नहीं करें। भोजन स्वाद लेने की वासना से नहीं अपितु भगवान का प्रसाद समझकर स्वस्थ रहने के लिए करना चाहिए।

बंगाल का सम्राट गोपीचंद संन्यास लेने के बाद जब अपनी माँ के पास भिक्षा लेने आया तो उसकी माँ ने कहाः “बेटा ! मोहनभोग ही खाना।”जब गोपीचन्द ने पूछाः “माँ ! जंगलों में कंदमूल-फल एवं रूखे-सूखे पत्ते मिलेंगे, वहाँ मोहनभोग कहाँ से खाऊँगा ?” तब उसकी माँ ने अपने कहने का तात्पर्य यह बताया कि “जब खूब भूख लगने पर भोजन करेगा तो तेरे लिए कंदमूल-फल भी मोहनभोग से कम नहीं होंगे।”

चबा-चबाकर भोजन करें, सात्त्विक आहार लें, मधुर व्यवहार करें, सभी में भगवान का दर्शन करें, सत्पुरूषों के सान्निध्य में जाकर आत्मज्ञान को पाने की इच्छा करें तथा उनके उपदेशों का भलीभाँति मनन करें तो आप जीते-जी मुक्ति का अनुभव कर सकते हैं।

I Hope you all have read the blog and nowI WILL TELL why it is so called.

Why message to Agriculture minister AND Health minister ?

Because it is given that if People chew the food properly we can save 5th part of our food Production. If Agriculture , food and Health minister stops selling of Nonveg Food no one will be suffering from Diseases.

यदि भोजन करने का सही ढंग आ जाय तो भारत में कुल प्रयोग होने वाले खाद्यान्न का पाँचवाँ भाग बचाया जा सकता है |

We can save Milk also  ?

यदि घूँट-घूँट करके पियेंगे तो एक पाव दूध भी ढाई पाव जितनी शक्ति देगा |

And why disease  can be prevented ?

Becuase मांस, अण्डे, शराब, बासी, जूठा, अपवित्र आदि तामसी भोजन करने से शरीर एवं मन-बुद्धि पर घातक प्रभाव पड़ता है, शरीर में बीमारियाँ पैदा हो जाती हैं। मन तामसी स्वभाववाला, कामी, क्रोधी, चिड़चिड़ा, चिंताग्रस्त हो जाता है तथा बुद्धि स्थूल एवं जड़ प्रकृति की हो जाती है। ऐसे लोगों का हृदय मानवीय संवेदनाओं से शून्य हो जाता है | And According to UN a person is said to healthy when he is mentally and physically fit. And When u have tension then how u can be mentally fit. So Stop Non veg food.

So I request The minister to stop showing ” SUNDAY HO YA MONDAY ROJ KHAO ANDAY ” and show ” Sunday ho ya monday roj sunno satsang rey “. This view is only mine and Aagay Minister ji aapki marji.

ARJI MERI MARJI AAPKI.

Advertisements

TRUE EDUCATION

25 May

Hariom,
Nashik satsang 2010, 14 Feb

Uuch vidya kya?
Hazaro logo ka dhan cheenkar uuch vidya ka lakshya nahi hai.
Logo ko barojkar karke aahankar sajana uuch vidya nahi.
Shree ram ji mey bada baaneney ki chesta nahi ki.
Uuch shiksha hai aauro ke aasu poochey.
Uuch vidya hai jo satta hai woh sabhi jano ke unnati mey lag jaye.

NITYA SE EKAKAR HO JAO

6 May

Ahemdabad
Pujya Swamiji satsang.

Aap satya swaroop mey tiko.
Chinta bhay asat hai sada nahi rahta par aap sat ho isliye sada tikte ho.
Murk aatamswabhav ko paraya mantey hai.
Aap chetan nitya hai .
Anitya ko bal mat dejeyi.
Bimari anitya hai aapne mey mat maano.

Hast chanchal se bacho. Pad chachal se bacho.
Vaani ka sanyam ho.
Netra chachal se urja naash hotey hai,
Hast chanchal aur aakhiri Pad chanchal.

ASARAMJI BAPU-KIDNEY PROBLEM AND SOLUTION.

20 May

गुर्दे के रोग एवं चिकित्सा हम गुर्दे या वृक्क (Kidney) के बारे में बहुत ही कम जानते हैं। जिस प्रकार नगरपालिका शहर को स्वच्छ रखती है वैसे ही गुर्दे शरीर को स्वच्छ रखते हैं। रक्त में से मूत्र बनाने का महत्त्वपूर्ण कार्य गुर्दे करते हैं। शरीर में रक्त में उपस्थित विजातीय व अनावश्यक बच्चों एवं कचरे को मूत्रमार्ग द्वारा शरीर से बाहर निकालने का कार्य गुर्दों का ही है। गुर्दा वास्तव में रक्त का शुद्धिकरण करने वाली एक प्रकार की 11 सैं.मी. लम्बी काजू के आकार की छननी है जो पेट के पृष्ठभाग में मेरुदण्ड के दोनों ओर स्थित होती हैं। प्राकृतिक रूप से स्वस्थ गुर्दे में रोज 60 लीटर जितना पानी छानने की क्षमता होती है। सामान्य रूप से वह 24 घंटे में से 1 से 2 लीटर जितना मूत्र बनाकर शरीर को निरोग रखती है। किसी कारणवशात् यदि एक गुर्दा कार्य करना बंद कर दे अथवा दुर्घटना में खो देना पड़े तो उस व्यक्ति का दूसरा गुर्दा पूरा कार्य सँभालता है एवं शरीर को विषाक्त होने से बचाकर स्वस्थ रखता है। जैसे नगरपालिका की लापरवाही अथवा आलस्य से शहर में गंदगी फैल जाती है एवं धीरे-धीरे महामारियाँ फैलने लगती हैं, वैसे ही गुर्दों के खराब होने पर शरीर अस्वस्थ हो जाता है। अपने शरीर में गुर्दे चतुर यंत्रविदों (Technicians) की भाँति कार्य करते हैं। गुर्दा शरीर का अनिवार्य एवं क्रियाशील भाग है, जो अपने तन एवं मन के स्वास्थ्य पर नियंत्रण रखता है। उसके बिगड़ने का असर रक्त, हृदय, त्वचा एवं यकृत पर पड़ता है। वह रक्त में स्थित शर्करा (Sugar), रक्तकण एवं उपयोगी आहार-द्रव्यों को छोड़कर केवल अनावश्यक पानी एवं द्रव्यों को मूत्र के रूप में बाहर फेंकता है। यदि रक्त में शर्करा का प्रमाण बढ़ गया हो तो गुर्दा मात्र बढ़ी हुई शर्करा के तत्त्व को छानकर मूत्र में भेज देता है। गुर्दों का विशेष सम्बन्ध हृदय, फेफड़ों, यकृत एवं प्लीहा (तिल्ली) के साथ होता है। ज्यादातर हृदय एवं गुर्दे परस्पर सहयोग के साथ कार्य करते हैं। इसलिए जब किसी को हृदयरोग होता है तो उसके गुर्दे भी बिगड़ते हैं और जब गुर्दे बिगड़ते हैं तब उस व्यक्ति का रक्तचाप उच्च हो जाता है और धीरे-धीरे दुर्बल भी हो जाता है। आयुर्वेद के निष्णात वैद्य कहते हैं कि गुर्दे के रोगियों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। इसका मुख्य कारण आजकल के समाज में हृदयरोग, दमा, श्वास, क्षयरोग, मधुमेह, उच्च रक्तचाप जैसे रोगों में किया जा रहा अंग्रेजी दवाओं का दीर्घकाल तक अथवा आजीवन सेवन है। इन अंग्रेजी दवाओं के जहरी प्रभाव के कारण ही गुर्दे एवं मूत्र सम्बन्धी रोग उत्पन्न होते हैं। कभी-कभी किसी आधुनिक दवा के अल्पकालीन सेवन की विनाशकारी प्रतिक्रिया (Reaction) के रूप में भी किडनी फेल्युअर (Kidney Failure) जैसे गम्भीर रोग होते हुए दिखाई देते हैं। अतः मरीजों को हमारी सलाह है कि उनकी किसी भी बीमारी में, जहाँ तक हो सके, वे निर्दोष वनस्पतियों से निर्मित एवं विपरीत तथा परवर्ती असर (Side Effect and After Effect) से रहित आयुर्वेदिक दवाओं के सेवन का ही आग्रह रखें। एलोपैथी के डॉक्टर स्वयं भी अपने अथवा अपने सम्बन्धियों के इलाज के लिए आयुर्वेदिक दवाओं का ही आग्रह रखते हैं। आधुनिक विज्ञान कहता है कि गुर्दे अस्थि मज्जा () बनाने का कार्य भी करते हैं। इससे भी यह सिद्ध होता है कि आज रक्त कैंसर की व्यापकता का कारण भी आधुनिक दवाओं का विपरीत एवं परवर्ती प्रभाव ही हैं। किडनी विकृति के कारणः आधुनिक समय में मटर, सेम आदि द्विदलो जैसे प्रोटीनयुक्त आहार का अधिक सेवन, मैदा, शक्कर एवं बेकरी की चीजों का अधिक प्रयोग चाय कॉफी जैसे उत्तेजक पेय, शराब एवं ठंडे पेय, जहरीली आधुनिक दवाइयाँ जैसे – ब्रुफेन, मेगाडाल, आइबुजेसीक, वोवीरॉन जैसी एनालजेसिक दवाएँ, एन्टीबायोटिक्स, सल्फा ड्रग्स, एस्प्रीन, फेनासेटीन, केफीन, ए.पी.सी., एनासीन आदि का ज्यादा उपयोग, अशुद्ध आहार अथवा मादक पदार्थों का ज्यादा सेवन, सूजाक (गोनोरिया), उपदंश (सिफलिस) जैसे लैंगिक रोग, त्वचा की अस्वच्छता या उसके रोग, जीवनशक्ति एवं रोगप्रतिकारक शक्ति का अभाव, आँतों में संचित मल, शारीरिक परिश्रम को अभाव, अत्यधिक शारीरिक या मानसिक श्रम, अशुद्ध दवा एवं अयोग्य जीवन, उच्च रक्तचाप तथा हृदयरोगों में लम्बे समय तक किया जाने वाला दवाओँ का सेवन, आयुर्वेदिक परंतु अशुद्ध पारे से बनी दवाओं का सेवन, आधुनिक मूत्रल (Diuretic) औषधियों का सेवन, तम्बाकू या ड्रग्स के सेवन की आदत, दही, तिल, नया गुड़, मिठाई, वनस्पति घी, श्रीखंड, मांसाहार, फ्रूट जूस, इमली, टोमेटो केचअप, अचार, केरी, खटाई आदि सब गुर्दा-विकृति के कारण है। सामान्य लक्षणः गुर्दे खराब होने पर निम्नांकित लक्षण दिखाई देते हैं- आधुनिक विज्ञान के अनुसारः आँख के नीचे की पलकें फूली हुई, पानी से भरी एवं भारी दिखती हैं। जीवन में चेतनता, स्फूर्ति तथा उत्साह कम हो जाता है। सुबह बिस्तर से उठते वक्त स्फूर्ति के बदले उबान, आलस्य एवं बेचैनी रहती है। थोड़े श्रम से ही थकान लगने लगती है। श्वास लेने में कभी-कभी तकलीफ होने लगती है। कमजोरी महसूस होती है। भूख कम होती जाती है। सिर दुखने लगता है अथवा चक्कर आने लगते हैं। कइयों का वजन घट जाता है। कइयों को पैरों अथवा शरीर के दूसरे भागों पर सूजन आ जाती है, कभी जलोदर हो जाता है तो कभी उलटी-उबकाई जैसा लगता है। रक्तचाप उच्च हो जाता है। पेशाब में एल्ब्यमिन पाया जाता है। आयुर्वेद के अनुसारः सामान्य रूप से शरीर के किसी अंग में अचानक सूजन होना, सर्वांग वेदना, बुखार, सिरदर्द, वमन, रक्ताल्पता, पाण्डुता, मंदाग्नि, पसीने का अभाव, त्वचा का रूखापन, नाड़ी का तीव्र गति से चलना, रक्त का उच्च दबाव, पेट में किडनी के स्थान का दबाने पर पीड़ा होना, प्रायः बूँद-बूँद करके अल्प मात्रा में जलन व पीड़ा के साथ गर्म पेशाब आना, हाथ पैर ठंडे रहना, अनिद्रा, यकृत-प्लीहा के दर्द, कर्णनाद, आँखों में विकृति आना, कभी मूर्च्छा और कभी उलटी होना, अम्लपित्त, ध्वजभंग (नपुंसकता), सिर तथा गर्दन में पीड़ा, भूख नष्ट होना, खूब प्यास लगना, कब्जियत होना – जैसे लक्षण होते हैं। ये सभी लक्षण सभी मरीजों में विद्यमान हों यह जरूरी नहीं। गुर्दा रोग से होने वाले अन्य उपद्रवः गुर्दे की विकृति का दर्द ज्यादा समय तक रहे तो उसके कारण मरीज को श्वास (दमा), हृदयकंप, न्यूमोनिया, प्लुरसी, जलोदर, खाँसी, हृदयरोग, यकृत एवं प्लीहा के रोग, मूर्च्छा एवं अंत में मृत्यु तक हो सकती है। ऐसे मरीजों में ये उपद्रव विशेषकर रात्रि के समय बढ़ जाते हैं। आज की एलोपैथी में गुर्दो रोग का सरल व सुलभ उपचार उपलब्ध नहीं है, जबकि आयुर्वेद के पास इसका सचोट, सरल व सुलभ इलाज है। आहारः प्रारंभ में रोगी को 3-4 दिन का उपवास करायें अथवा मूँग या जौ के पानी पर रखकर लघु आहार करायें। आहार में नमक बिल्कुल न दें या कम दें। नींबू के शर्बत में शहद या ग्लूकोज डालकर 15 दिन तक दिया जा सकता है। चावल की पतली घेंस या राब दी जा सकती है। फिर जैसे-जैसे यूरिया की मात्रा क्रमशः घटती जाय वैसे-वैसे, रोटी, सब्जी, दलिया आदि दिया जा सकता है। मरीज को मूँग का पानी, सहजने का सूप, धमासा या गोक्षुर का पानी चाहे जितना दे सकते हैं। किंतु जब फेफड़ों में पानी का संचय होने लगे तो उसे ज्यादा पानी न दें, पानी की मात्रा घटा दें। विहारः गुर्दे के मरीज को आराम जरूर करायें। सूजन ज्यादा हो अथवा यूरेमिया या मूत्रविष के लक्षण दिखें तो मरीज को पूर्ण शय्या आराम (Complete Bed Rest) करायें। मरीज को थोड़े परम एवं सूखे वातावरण में रखें। हो सके तो पंखे की हवा न खिलायें। तीव्र दर्द में गरम कपड़े पहनायें। गर्म पानी से ही स्नान करायें। थोड़ा गुनगुना पानी पिलायें। औषध-उपचारः गुर्दे के रोगी के लिए कफ एवं वायु का नाश करने वाली चिकित्सा लाभप्रद है। जैसे कि स्वेदन, वाष्पस्नान (Steam Bath), गर्म पानी से कटिस्नान (Tub Bath)। रोगी को आधुनिक तीव्र मूत्रल औषधि न दें क्योंकि लम्बे समय के बाद उससे गुर्दे खराब होते हैं। उसकी अपेक्षा यदि पेशाब में शक्कर हो या पेशाब कम होता हो तो नींबू का रस, सोडा बायकार्ब, श्वेत पर्पटी, चन्द्रप्रभा, शिलाजीत आदि निर्दोष औषधियों या उपयोग करना चाहिए। गंभीर स्थिति में रक्त मोक्षण (शिरा मोक्षण) खूब लाभदायी है किंतु यह चिकित्सा मरीज को अस्पताल में रखकर ही दी जानी चाहिए। सरलता से सर्वत्र उपलब्ध पुनर्नवा नामक वनस्पति का रस, काली मिर्च अथवा त्रिकटु चूर्ण डालकर पीना चाहिए। कुलथी का काढ़ा या सूप पियें। रोज 100 से 200 ग्राम की मात्रा में गोमूत्र पियें। पुनर्नवादि मंडूर, दशमूल, क्वाथ, पुनर्नवारिष्ट, दशमूलारिष्ट, गोक्षुरादि क्वाथ, गोक्षुरादि गूगल, जीवित प्रदावटी आदि का उपयोग दोषों एवं मरीज की स्थिति को देखकर बनना चाहिए। रोज 1-2 गिलास जितना लौहचुंबकीय जल (Magnetic Water) पीने से भी गुर्दे के रोग में लाभ होता है। शय्यामूत्र का इलाज जामुन की गुठली को पीसकर चूर्ण बना लो। इस चूर्ण की एक चम्मच मात्रा पानी के साथ देने से लाभ होता है। रात को सोते समय प्रतिदिन छुहारे खिलाओ। 200 ग्राम गुड़ में 100 ग्राम काले तिल एवं 50 ग्राम अजवायन मिलाकर 10-10 ग्राम की मात्रा में दिन में दो बार चबाकर खाने से लाभ होता है। रात्रि को सोते समय दो अखरोट की गिरी एवं 20 किशमिश 15-20 दिन तक निरन्तर देने से लाभ होता है। सोने से पूर्व शहद का सेवन करने से लाभ होता है। रात को भोजन के बाद दो चम्मच शहद आधे कप पानी में मिलाकर पिलाना चाहिए। यदि बच्चे की आयु छः वर्ष हो तो शहद एक चम्मच देना चाहिए। इस प्रयोग से मूत्राशय की मूत्र रोकने की शक्ति बढ़ती है। पेट में कृमि होने पर भी बालक शय्या पर मूत्र कर सकता है। इसलिए पेट के कृमि का इलाज करायें।

HEALTH TIPS DURING THE SUMMER SEASON.

12 May

 

Health Care in the Summer (Grishma) Season

GuruDarshanWP-91[1]

 

Recommended Diet:

 The recommended diet during this season comprises khir made from milk and rice, fresh fruit juice, shikanji, lemon sherbet, thandai and other fluids that are unctuous and sweet. These provide strength along with a pleasing satisfaction. Sherbet made with roasted mango tamarind or wild mangosteen along with jaggery and cumin seeds protects one against physical disorders common to this season. Shrikhand, though normally insalubrious, can be consumed during these days.

Consumption of old sathi rice, wheat, milk, butter and cow ghee is recommended during summers to keep the body cool, strong and agile. Amongst vegetables, gourds, pumpkins, nenua, pointed gourd, bitter gourd, flower of banana, chaulayi, green cucumber, green coriander, mint and amongst fruits, watermelon, muskmelon, coconut, sweetlemon, mango, apple, pomegranate and grapes are considered beneficial.

Insalubrious diet: Salty, dry, stale, hot, spicy, fried, sharp, sour, pungent, bitter foods like amchur, pickles and tamarind, etc. should be avoided. Never consume cold drinks, ice cream, ice fruit and canned fruit juices to alleviate the effects of heat. They induce acidity and therefore increases internal heat. They give rise to hemorrhagic disorders, itching, skin diseases and irritability.

Note: With the onset of summer, the pleasant atmosphere of spring disappears and the hot winds hold sway. Just as water reservoirs and lakes run dry on account of the scorching Sun rays, living beings also suffer from dehydration and become prone to diseases resulting from the dry and hot weather of the season. To protect the body against the harmful effects of this changing environment, it is very necessary to adopt certain changes in food habits as well as in the mode of living.

If you make it a habit to drink a glass of water before going out in the Sun, you substantially reduce the risk of suffering a heat stroke. Morning hydrotherapy is considered to be extremely beneficial during these days.

Staying awake at night should be totally avoided during the summer. It increases pitta. If, for some reason one has to stay awake, one should drink a glass of water every hour.

It is not good for health to drink water or wash one’s hands, feet and head with cold water immediately after coming in from the hot weather outside. Take rest for a while and drink water only after the sweat is completely evaporated and the body has cooled down.

Your life-force is adversely affected when you move about in the sun bare-headed. So do make it a point to put on a cap or a piece of cloth on your head before going out in the Sun. During the summer months, getting up early in the morning before the sunrise and taking a morning stroll cheers up the mind and invigorates the body.

To prevent weakness and restlessness, that are natural consequences of the summer season, try any of these healthful drinks :

1. Coriander Drink: Powder equal amounts of coriander seeds, cumin seeds and aniseeds. Then take black grapes and candied sugar twice the amount of the above mixture and intermix them thoroughly.

Usage: Soak one teaspoonful of the above mixture in 200 ml of water. After 2 hours, squeeze it thoroughly with your hands and drink the sieved liquid. This helps reduce internal body heat, burning in the palms and soles, burning sensation in the eyes and urinary tract, acidity, headache caused by aggravated pitta, etc.

Use of Gulkand also alleviates the problems of burning sensation in the eyes, disorders of pitta and ill effects of excessive heat.

2. Thandai: Two spoonfuls each of cumin seeds and aniseeds, four spoonfuls of poppy seeds, four spoonfuls of watermelon seeds, 15 to 20 pieces of black pepper and 20 to25 number of almonds should be soaked overnight. Remove the outer skin of the almonds in the morning and grind all the ingredients together. Add 1 kg of sugar or candied sugar to 4 litres of water and bring it to a boil. Add a little milk and skim the liquid. Now add the above-pulverised mixture, one bowl of rose petals and the powder of 10 to 15 cardamoms to the syrup and let it simmer over a low flame. Let the syrup become thick enough (tested by taking one spoon of syrup from the container. If while removing the spoon three strands of liquid connect the liquid in the spoon to the container, the syrup is ready). Then sieve the syrup, let it cool and store it in a glass jar.

Usage: One can take this syrup during daytime or at least two hours before going to bed by adding it to cold milk or water. Apart from being aromatic, it is nourishing as well. It removes the accumulated heat from the body, soothes the brain and induces sound sleep at night.

3. Mango Pana: Boil raw mangoes in water. After cooling, crush the pulp of the mango in cold water and make a syrup. One may add jaggery, cumin seeds, mint and salt for taste. A glass of Pana is especially recommended in the afternoon. This is a traditional recipe of our country to maintain good health during the summer. This protects one from sunstroke as well.

4. Rose sherbet: A sherbet concentrate made by mixing one and a half kilogram of sugar with 100 grams of desi roses (not the red ones) is definitely more effective than the sherbets sold in the market. Saccharine, colours and advertisements add to the cost of the sherbets sold in the market. It is much better to prepare such sherbet at home. It gives relief in burning sensation of the eyes and feet. It is a soothing cold drink. If possible, boil a piece of wood from the Pipal (Bunyan) tree in the sherbet. Its cooling effect would be beneficial.

Soft drinks available in the market, such as Pepsi, Coca-cola, etc. are made from impious substances and contain a number of harmful chemicals. They may provide temporary relief but actually increase the internal heat immensely. They are but colourful poisons in attractive bottles. Therefore beware of such drinks.

NARAD JAYANTI (10 MAY)

9 May

 

Narad muni

Narad muni

Sage Narada, the Possessor of Divine Virtues (Naradji Jayanti: 10th May) Once Lord Krishna worshipped Sage Narada in Mahi-sagara-sangam. There king Ugrasena asked Him: “O Lord of the world, Sri Krishna! Why is Sage Narada exceedingly fond of you?” Lord Krishna said: “O King! I always eulogize Narada of divine vision by means of the hymn pronounced by Mahendra. Listen to it, O King: ‘I bow down to that Narada who has been born from the lap of Brahma, who has no arrogance due to learning or good conduct, but whose learning and good conduct are well-known. I bow down to that Narada who has none of these defects – absence of interest, anger, fickleness and fear. He is composed and free from (habitual) procrastination. I pay obeisance to that Narada who does not change his word (once uttered) either due to lust or to covetousness and who is conversant with the principles and goal of spiritual endeavour, who is forbearing, powerful and straightforward, who has conquered his sense organs and who speaks the truth. ‘I bow down to that Narada who is fullgrown and venerable in respect of splendour, fame, intellect, prudence, humility, birth and penance, whose conduct and dress are pleasing and whose diet, behaviour, eyes and utterances are good, who is tirelessly engaged in altruism, who has no sin, who is enthusiastically engaged in bringing good to others, who always abides by the duties enjoined in the Vedas, Smritis and Puranas and who is free from (i.e. is above) either pleasure or displeasure, who is uninterested in food stuffs and other things, who is learned, who is never idle, who is a Brahmana of vast learning and whose narratives are charming, who has never erred before in respect of wealth, anger and love and by whom these defects have been eliminated, who is devoid of the defect of infatuation and fascination, who has unwavering devotion to God and Bhagawat Dharma, whose moral policies are supreme and who is of a reserved disposition, who is never contaminated by contacts, who is eloquent and who has no prolonged doubts, who never finds faults with any scriptural text, whose life is a personification of penance, who never spends his time without recollecting God and who always keeps his mind under control. ‘I salute that Narada who puts in great efforts, who exerts his intelligence, who is never satiated with concentration and meditation and who never errs in his efforts, who does not become elated by the acquisition of wealth, who does not become dejected on account of non-acquisition, who is richly endowed with all good qualities, who is efficient, pure and unafraid, who knows the proper occasions and is conversant with good policies.’ “Everyday I recite this hymn of Narada, O King. Therefore, the excellent sage has great love for me. If any other person too remains pure and repeats this prayer everyday, he will ere long attract great favour of the celestial sage.” Through this eulogy of the celestial 

sage Narada, the Lord presents the ideal

virtues of devotees. Such is the glory of a

devotee that he is eulogized by God

Himself. One who remembers the virtues

of the Lord’s devotees, becomes dear to

them and imbibes their virtues as well.

Recollecting and talking about a devotee

and his virtues purifies the heart and brings

good to the world.

Naradji, who has the good of all living

beings in his mind, helps those who are

desirous of progressing on the path of God.

It is impossible to assess how many and in

what manner beings have been transported

by him to the Lord’s pious feet. He is ever

engaged in guiding the devotees andinquisitive seekers and in the good of

saintly  souls who desire to attain liberation in life.Our crores of obeisances at His feet !